उपरत्नों का महत्व ऐवम उपयोग

उपरत्न : नीली

नीलम का सर्वश्रेष्ठ उपरत्न नीली है, श्रेष्ठ नीली पूर्णरूपेण पारदर्शक तथा कुछ श्याम सी आभा लिए हुये नीले रंग की होती है। दोष युक्त नीली धारण करना श्रेष्ठ नहीं होता। यह रत्न देखने से काँच का आभास होता हैं, लेकिन यदि इसे हाथ में लिया जाय तो अपेक्षाकृत अधिक भार प्रतीत होता है।

नीलम के अभाव में इसे धारण किया जाता है। जो अशुभ शनि के प्रभाव को कम करता है बाहर जगत में शनि लौह व्यवसाय, मशीनरी, तैलादि, तथा चर्म उद्योग का कारक ग्रह है शुभ शनि की विशेष स्थितियाँ ही व्यक्ति को तांत्रिक, योगी, सिद्ध, संत दार्शनिक आदि बनाती है। अर्थ यह कि क्रूर ग्रह की संज्ञा से विख्यात ग्रह शनि भी यदि कुंडलीगत अशुभ शनि से सुरक्षा तथा शुभ शनि के प्रभाव में वृद्धि के लिए शनि रत्न अथवा उपरत्न धारण करने का परामर्श दिया जाता है।

नीली का प्राप्ति स्थान – भारत के अनेक क्षेत्रों में भारत के अलावा श्रीलंका, बर्मा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, अफ्रीका, रूस आदि देशों में पाया जाता है इनमें से कुछ स्थानों में उत्तम एवं कुछ स्थानों में मध्यम प्रकार की नीली प्राप्त होती है।

तत्व की संरचना – यह एक भंगुर रत्न है। अल्यूमिनियम तथा आक्सीजन के योग से निर्मित यह रत्न कोबाल्ट मिश्रित होने के कारण नीले रंग का दिखाई देता है। नीली रत्न का रंग नीले एवं हरे रंग से बनता है यह कोमल, चिकना, चमकदार होता है। नीलम की अपेक्षा इसमें कम गुण पाये जाते हैं।

नीली का दोष – जो नीली चमकरहित अथवा क्षीण चमक वाला होता है। ऐसे नीली को शून्यसंज्ञक कहते हैं श्रेष्ठ नीली वह होता है जो पूरी तरह एक रंग का हो विभिन्न रंग वाला नीली दोषपूर्ण माना जाता है किसी भी प्रकार का चिन्ह अथवा धब्बा नहीं होना चाहिए ऐसे नीली धारण करने से व्यक्ति कंगाल होता है।

फिरोजा

फिरोजा अपारदर्शक रत्न होते हुए भी अपने रंग की सुन्दरता के कारण प्रमुख रत्नों की श्रेणी में माना जाता है। बहुत प्राचीन समय से यह सोने-चांदी के आभूषणों में लगाया जाता है। आसमानी नीले रंग का फिरोजा अधिक उत्तम समझा जाता है। सूर्य के प्रकाश से तथा गर्म करने पर एवं पसीने के संयोग से इसका रंग खराब हो जाता है।

फिरोजा अधिकतर शिलाओं की पपड़ियों में पाया जाता है। इसकी कठोरता 5.6 से 6, तथा आपेक्षिक गुरुत्व 2. 6 से 2.8, वर्तनांक 1.61 – 1.65 तथा दुहरार्तन 0.04 होता है। आधुनिक रसायन शास्त्र की दृष्टि से फिरोजा अल्यूमीनियम, लोहा तथा तांबे व फास्फेट का यौगिक होता है। इसमें थोड़ी मात्रा में जल भी होता है। इसमें नीला रंग तांबे के कारण तथा हरापन लोहे के कारण होता है।

उत्तम फिरोजा धारण करने वाले को प्रेम संबंधों में सफलता मिलती है। कहते हैं फिरोजा अपना रंग बदलकर आने वाले खतरों की पूर्व सूचना देता है तथा रक्षा कवच का काम करता है। फिरोजा धारक का नेत्र, गले व मुंह के रोगों से रक्षा करता है।

यह रत्न असामान्य व अद्भुद् दैवीय शक्ति का पुंज है, मुस्लिम संस्कृति में फिरोजा अत्यन्त प्रिय माना गया है। यह उपरत्न धारण करने से लेखनकला एवं प्रतिभा में वृद्धि होती है सौंदर्य प्रसाधन से सम्बन्धित महिलाओं के लिए यह रत्न अत्यन्त गुणकारी है। यह रत्न प्रेमी-प्रेमिकाओं के सम्बन्ध में मधुरता उत्पन्न करता है। रूस में आज भी विवाह के सम्बन्ध में फिरोजा उपरत्न की अंगूठी भेंट में दी जाती है। तुर्की इसे विजय का प्रतीक कहते हैं यह रत्न घृणा को नष्ट करके प्रेम और सद्भावना की वृद्धि करता है। यह रत्न धारक के शरीर में विष प्रवेश करने पर अपना रंग बदल देता है एवं खण्डित हो जाता है।

जर्कन

वर्ण, जाति और गुणों में तुरसावा के समान होने के कारण रत्न परीक्षक विद्वान जर्कन को ही तुरसावा बतलाते हैं।

कितने ही विद्वान जर्कन को गोमेद कहते हैं। यद्यपि दोनों के वर्ण में समानता है, किन्तु इनकी कठोरता और आपेक्षिक गुणत्व में अंतर है तथा गोमेद की जाति भी भिन्न होती है। अधिकतर पाश्चात्य रत्नशास्त्री गोमेद को गार्नेट वर्ग का खनिज मानते हैं तथा जर्कन को जर्कन वर्ग का खनिज व जिरकेनियम सिलिकेट का यौगिक मानते हैं अतः गोमेद व जर्कन भिन्न जाति के रत्न हैं।

जर्कन सुनहरा पीला, ललाई युक्त पीला, हरा एवं आसमानी रंग का मिलता है। यह ताप उपचार द्वारा वर्णहीन बनाया जाता है। जर्कन में हीरे के समान द्युति पाई जाती है। प्रकाश किरणों का दुहरावर्तन होने के कारण वर्णहीन जर्कन हीरे के समान मालूम पड़ता है।

जर्कन के औषधि गुणनिद्रानाश, वातरोग, चर्मरोग, मूलव्याध, जलोदर, पाचनशक्ति आदि रोगों में यह रत्न अत्यन्त गुणकारी है। आयुवेदाचार्यों के अनुसार जर्कन के भष्म को भी अनेक बीमारियों के लिए उपयोग में लाया जाता है।

दैवीय शक्तिजर्कन में किसी भी कार्य को निर्विरोध सम्पन्न होने के लिए दैवीय शक्ति समाहित होती है। अतः इस रत्न को धारण करने से घर में सभी प्रकार की शान्ती एवं सुलभता का निर्माण होता है। समाज में मान-सम्मान की प्रतिष्ठा प्रदान होती है तथा धारक को शक्ति प्रदान करके चुस्त-दुरुस्त रखने में सहायता प्रदान करता है। यह रत्न किसी प्रकार से भी हानि उत्पन्न नहीं करता इस रत्न को स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध प्रत्येक लोग धारण कर सकते हैं। विशेषतः यह रत्न वृषभ राशि के लोगों का उपरत्न है।

उपरत्नों का महत्व ऐवम उपयोग

हकीक (अकीक)

हकीक एक अल्पमोली पत्थर है जिसे उपरत्न की श्रेणी में माना जाता है। यह अपारदर्शक होता है जो कि अनेक रंगों में पाया जाता है। आजकल प्राकृतिक रत्न इतने मंहगे हैं कि हर कोई उन्हें खरीद नहीं सकता। जो लोग मंहगे रत्न खरीदने में असमर्थ हैं वे अपने ग्रहों के अनुसार या किसी भी रंग के अकीक को धारण कर सकते हैं। चांदी में धारण किया जाने वाला यह रत्न सामान्य कीमत का रत्न है। इसे साधारण जौहरी की दुकान से भी प्राप्त किया जा सकता है। इसे मुस्लिम सम्प्रदाय परम पवित्र रत्न मानता है और धारण योग्य कहता है।

प्राप्ति स्थान  – यह भारत के विन्ध्य एवं सतपुड़ा के अतिरिक्त त्रिवेन्द्रम के आस पास के क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। वर्मा में भी कुछ स्थानों पर तथा अरब देशों में भी पाया जाता है।

उपयोग से लाभ – अकीक धारण से भूत प्रेत आदि रक्षा तथा नजर दोष, प्रेत दोष एवं बुरी नजरों से बचाता है तथा पाचन क्रिया को भी लाभ देता है एवं अलग-अलग रंगों का अलग-अलग लाभ है।

  • काले रंग का हकीक धारण करके कनकधारा का पाठ करने से लक्ष्मी लाभ होता है।
  • स्नेहपूर्ण जीवन के लिए हरे रंग का हकीक धारण करना श्रेष्ठ है।
  • श्वेत हकीक शुक्र दोष और मन को शान्त करता है।

अंबर स्टोन

यह एक बहुत ही हल्का रत्न है। यह पीले भूरे या शहद के रंग का होता है। इस रत्न में पृथ्वी के टुकड़ों, पत्तियों, कीड़े-मकोड़ों आदि के चित्र-से दिखाई देते हैं। यह रत्न शरीर तथा मन दोनों को स्वस्थ रखता है। इसे पहनने से व्यक्ति में उत्तेजना की भावना पर नियंत्रण होता है।

कई बार व्यक्ति चाहे अनचाहे उत्तेजना में या जल्दबाजी में गलत कार्य कर बैठता है, जिससे बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में उसका रक्तचाप बढ़ जाता है या आवश्यकता से अधिक घट जाता है अंबर स्टोन हमारे रक्तचाप को नियंत्रित करता है तथा मानिसक उद्वेग को नियंत्रित करते हुए हमारी ऊर्जा को सही मार्ग पर लगाता है, जिससे हम पूरी मानसिक तन्मयता के साथ सफलतापूर्वक कार्य कर सकते हैं।

इस रत्न को धारण करने से मन में अनिश्चितता की भावना समाप्त होती है। हमारे जीवन के उतार-चढ़ाव के कारण जो मानसिक दबाव बनता है, उसे नियंत्रित करके यह रत्न हमारे मस्तिष्क को संतुलित बनाए रखता है।

यह हमारे शरीर में छिपी शक्ति को उजागर करने में सक्षम है, क्योंकि इसमें ऋणात्मक विद्युत शक्ति होती है। जिस तरह चुंबक का एक सिरा उसके दूसरे सिरे को अपनी ओर आकर्षित करता है, उसी प्रकार अंबर स्टोन व्यक्ति में धनात्मक ऊर्जा को उभारकर उसे ऊर्जावान, शक्तिशाली तथा क्रियाशील बनाता 1

उपयोग विधि – अंबर रत्न को अन्य रत्नों की भांति लॉकेट या अंगूठी में धारण किया जा सकता है। इसे शास्त्रों के अनुसार गुरु ग्रह का उपरत्न माना गया है। अतः गुरुवार को गुरु की होरा में प्रातः काल गंगाजल और कच्चे दूध से शुद्ध करके गुरु के निम्नलिखित मंत्र के उच्चारण के साथ तर्जनी में धारण करना चाहिए ।

  • ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः ।

यह रत्न सोने या चांदी की अंगूठी में धारण करना चाहिए। यदि अंगूठी धारण नहीं करना चाहें तो लॉकेट के रूप में भी धारण कर सकते है। इसे हमेशा धारण करने से रक्तचाप हमेशा नियंत्रित रहता है तथा रक्तचाप की अनियमितता से होने वाली दिल की बीमारी जैसे गंभीर रोगों से भी बचा जा सकता है।

इस रत्न को धारण करने के अतिरिक्त इसे जल में, विशेषकर गुलाब जल में डालकर उस जल का सेवन करने से इस रत्न का प्रभाव सौ गुना तक बढ़ जाता है। यदि संभव हो, तो आधे गिलास पानी में पांच अंबर रत्न को डालकर रात भर छोड़ दें और सुबह खाली पेट उस पानी को पीएं। संभव हो, तो दिन में भी उसी में से पानी लें, ऊपर वर्णित सभी रोगों से मुक्ति मिलेगी तथा आपका शरीर स्वस्थ, कांतिवान तथा ऊर्जावान बनेगा और आपका । मानसिक संतुलन बना रहेगा। सभी कार्यों में आपका मन लगेगा तथा हर कार्य में अभूतपूर्व सफलता भी मिलेगी ।

यह रत्न वृष राशि वालों (20 अप्रैल से 20 मई के बीच जन्मे) के लिए जीवन रत्न के रूप में व सिंह राशि वालों (23 जुलाई से 22 अगस्त के बीच जन्मे) के लिए भाग्य रत्न के रूप में भी कार्य करता है।

किडनी स्टोन (जेड)

यह गहरे हरे रंग का अपारदर्शी रत्न होता है। इसकी ऊपरी सतह पर किडनी की आकृति दिखाई देती है। यह रत्न हेपेटाइट की किस्म का रत्न है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है, यह रत्न किडनी से संबंधित बीमारियों से मुक्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त यह रत्न हृदय पेट आदि की बीमारी से बचाव के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है।

गुर्दे से संबंधित बीमारी और इसके फलस्वरूप डायलिसिस पर रखे गए रोगियों के लिए या फिर जिन्हें डॉक्टर ने गुर्दा बदलवाने की सलाह दी हो उनके यह रत्न अत्यंत लाभदायक व प्रभावी होता है। यह रत्न जितना देखने में साधारण होता है, इसके लाभ उतने ही चमत्कारी होते हैं। जिनका स्वास्थ्य ऊपर वर्णित बीमारी के कारण ठीक नहीं रहता हो और जीवन दूभर हो गया हो, उन लोगों को यह रत्न अवश्य धारण करना चाहिए।

उपयोग विधि – इस रत्न को अंबर रत्न के समान अंगूठी या लॉकेट में धारण किया जा सकता है। इसे बुध ग्रह से संबंधित रत्न माना जाता है। इसे बुधवार को बुध की होरा में बुध के निम्नलिखित मंत्र से अभिमंत्रित और गंगाजल व पंचामृत से शुद्ध करके सोने या चांदी की धातु में धारण करना चाहिए ।

  • ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः ।

इस रत्न को धारण करने के साथ-साथ इसका जल ग्रहण किया जाए तो इसका प्रभाव भी अंबर रत्न की तरह सौ गुना बढ़ जाता है।

रात को कांच के एक गिलास में आधा गिलास पानी भरकर उसमें चार-पांच किडनी स्टोन डालकर छोड़ दें। सुबह खाली पेट वह पानी पी जाएं और फिर से ताजा पानी भर दें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, रत्न का प्रभाव धीरे-धीरे आपको रोगमुक्त कर देगा और आप स्वस्थ होकर आनंदमय जीवन व्यतीत कर सकेंगे।

यह रत्न प्रेम आकर्षण, प्रेम वृद्धि, दुर्घटना से बचाव, धन वृद्धि और धन के सदुपयोग की शक्ति को भी बढ़ाता है।

ओपल

यह हीरे का उपरत्न है। हीरे के मूलतः दो उपरत्न हैं जरकिन (अमेरिकन डायमंड) और ओपल । जरकिन का स्वभाव गर्म होता है, जबकि ओपल का स्वभाव ठंडा जरकिन का स्वभाव गर्म होने के कारण यह कामुकता को बढ़ाता है, जबकि ओपल हमारे सुख, समृद्धि, प्रेम, माधुर्य एवं आपसी संबंधों को सुधारता है।

जब व्यक्ति युवावस्था और वृद्धावस्था के बीच अर्थात 45 वर्ष के लगभग होता है, उस समय हीरे के स्थान पर जरकिन की सलाह न देकर ओपल रत्न पहनने की सलाह दी जाती है, जो हीरे के समान ही कार्य करता है। परंतु व्यक्ति की कामशक्ति सामान्य ही रहती है।

जब पति-पत्नी के बीच संबंधों में कड़वाहट या दरार आने लगे, तो ओपल रत्न धारण कर संबंधों को पुनर्जीवित करके आपसी माधुर्य को बढ़ाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त यह रत्न मानसिक स्तर की भी वृद्धि करता है जब व्यक्ति अपने आप को मानसिक तौर पर निराश और थका हुआ महसूस करता है, उस समय ओपल मन को पुनः ऊर्जावान करके नए जोश और उमंग के साथ जीने की ऊर्जा प्रदान करता है और मंद और बुझा हुआ मन पुनः रोमांच और उत्साह से भर उठता है। इस तरह इसे धारण करने से व्यक्ति मानसिक अवसाद की स्थिति से बच सकता 1

उपयोग विधि – यह सफेद रंग का हल्का रत्न होता है। इसकी सतह से सतरंगी प्रकाश निकलते रहते हैं। देखने से ऐसा प्रतीत होता है मानो इसकी सतह पर जगह-जगह से आग की चिंगारियां निकल रही हों।

इस उपरत्न को चांदी की अंगूठी और लॉकेट में धारण किया जाता है। इसे शुक्रवार को शुक्र की होरा में शुक्र के निम्नलिखित मंत्र से अभिमंत्रित करके सीधे हाथ की अनामिका में धारण करना चाहिए। पहनने से पूर्व इसे कच्चे दूध और गंगाजल से शुद्ध अवश्य कर लेना चाहिए।

  • ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ।

जन्मकुंडली में शुक्र जल तत्व राशि में स्थित हो, तो भी शुक्र के लिए ओपल पहनने की सलाह दी जाती है। जल तत्व राशियां हैं – कर्क, वृश्चिक और मीन।

इस प्रकार ओपल रत्न धारण करके आप अपने जीवन को और अधिक सुखी, समृद्ध और मधुर बना सकते हैं। इसे यदि आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को उपहार में अंगूठी या लॉकेट के रूप में भेंट स्वरूप देते हैं, तो आपके बीच परस्पर आकर्षण बढ़ेगा व प्रेम में वृद्धि होगी।

ओपल को कड़े या चूड़ी में जड़वाकर या ब्रेसलेट में पहनने से भी समान लाभ की प्राप्ति होती है।

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